सामाजिक विज्ञान के शोध प्रविधि में परिकल्पना का महत्व
डिश्वर नाथ खुटे
शोध छात्र, इतिहास अध्ययन शालाए पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर (छ.ग.)
भूमिका:-
सामाजिक शोध सामाजिक घटनाओं का वैज्ञानिक अध्ययन है और कोई भी अध्ययन तब तक वैज्ञानिक नहीं हो सकता जब तक उसमें वैज्ञानिक पद्धति को काम में न लाया जाय। इस वैज्ञानिक पद्धति का सदुपयोग तब तक नहीं हो सकता जब तक हमें अपने अध्ययन विषय के संबंध में कुछ न कुछ आरंभिक ज्ञान एवं सामान्य अनुभव न हो। इस आरंभिक ज्ञान व अनुभव के आधार पर हम अपने अध्ययन विषय के विभिन्न पक्षों के संबंध में एक सामान्य अनुमान पहले से ही लगा सकते है। वह सामान्य अनुमान शोधकर्ता के लिये एक मार्ग निर्देशक बन जाता है और शोधकर्ता का ध्यान कुछ निश्चित व अनावश्यक तथ्यों पर ही केन्द्रित करके अनुसंधान की दिशा को निर्धारित करता है और उसे अनिश्चितता के अंधकार में भटकने से बचा देता है। 1
परिकल्पना का अर्थ:-
परिकल्पना शब्द का निर्माण दो शब्दों से मिलकर बना है ।परि $ कल्पना = परिकल्पना। परि का अर्थ होता है ‘‘चारों ओर’’ तथा कल्पना का अर्थ होता है एक सामान्य अनुमान।2’’ सर्वेक्षणकर्ता अध्ययन कार्य आरंभ करने से पूर्व ही विषय के विभिन्न पक्षों से संबंधित कुछ सामान्य अनुमान अवश्यमेव लगा लेता है। इस तरह के अनुमान का अंदाजा लगा लेना सर्वेक्षणकर्ता के लिये आगामी अध्ययन के लिये दिशा निर्धारण करना है।
परिकल्पना की परिभाषा:-
परिकल्पना के बारे में विभिन्न विद्वानों के विचार निम्न प्रकार से है -
1. वेबस्टर न्यू इन्टरनेशनल डिक्शनरी आफ दी इंग्लिश लेग्वेज के अनुसार - ‘‘एक परिकल्पना, एक विचार, दशा या सिद्धांत है जिसे संभवतः बिना किसी विश्वास के मान ली जाती है जिससे कि उसके तार्किक परिणाम निकाले जा सकें और ज्ञात या निर्धारित किये जाने वाले तथ्यों की सहायता से इस विचार की सच्चाई की जांच की जा सकें।’’
2. पी.वी.यंग के अनुसार:- ‘‘एक कार्यवाहक विचार जो कि उपयोगी खोज का आधार बनता है, कार्यवाहक परिकल्पना कहलाता है।’’
3. गुडे एंड हाॅट के शब्दों में:- ‘‘एक परिकल्पना एक विचार है जिसकी सत्यता सिद्ध करने के लिये उसका परीक्षण किया जा सकता है।’’
4. लुण्डवर्ग के अनुसार - ‘‘एक परिकल्पना एक कामचलाऊ सामान्यीकरण है जिसकी सत्यता की परीक्षा करना अभी बाकी है। ’’3
5. टाउन सैण्ड के अनुसार - ‘‘परिकल्पना अनुसंधान की समस्या के लिये सुझाया गया उत्तर है।’’
6. एम.एच. गोपाल के अनुसार - ‘‘यह ज्ञात व प्राप्त तथ्यों के एक सामान्य प्रेक्षण पर आधारित एक अस्थाई उपचार या हल होता है, जो कि विशेष घटनाओं के समझने व अन्य की खोज में मार्गदर्शन के लिये अपनाया जाता है।’’4
परिकल्पना के स्त्रोत:- परिकल्पना के निम्नलिखित मुख्यस्त्रोत है -
1. सामान्य संस्कृति:- किसी विशेष संस्कृति के मूल्य, विश्वास, लोक कथाएं, दर्शन, धर्म आदि परिकल्पनाओं के निर्माण के महत्वपूर्ण स्त्रोत है। भारतीय संस्कृति के संदर्भ में जाति, परिवार, ग्रामीण संरचना संबंधी उपकल्पनाओं का विकास सरल है।5
2. वैज्ञानिक सिद्धांत:- वैज्ञानिक सिद्धांत की परिकल्पनाओं को जन्म देती है। जिन सिद्धांतों की हमें जानकारी है उनका संबंध हम जाने-अनजाने सामाजिक घटना से जोड़ने का प्रयास करते है। इस प्रकार किसी सिद्धांत की विवेचना कर परिकल्पना का निर्माण करते है।
3. समरूपता:- समरूपता से तात्पर्य दो विषयों घटनाओं व व्यवहारों में पाई जाने वाली समानताओं से है। अनेक प्रकार की समानताएॅ भी परिकल्पना को जन्म देती है। जैसे - लुई पाश्चर का चेचक के टीके लगाने के सिद्धांत में गायों को चेचक से संक्रमित होने तथा उसी के सादृश्य मनुष्य के शरीर में चेचक के विषाणु छोड़ने को उपकल्पना माना गया।
4. व्यक्तिगत अनुभव:- जीवन की अनेक प्रकार की घटनाओं और अनुभव के आधार पर भी अनेक उपकल्पनाओं को विकसित किया जा सकता है। जैसे - डाॅ. लाम्ब्रीसो ने पाया कि अपराधी जन्मजात होते है तथा अपनी शारीरिक विशेषताओं में वे सामान्य व्यक्तियों से भिन्न रहते है।6
5. क्षेत्र विशेष में हुए अनुसंधान:- उस क्षेत्र मंे जो अनुसंधान कार्य हो चुके है, उन्हें देख कर तथा जो व्यक्ति कार्य पर चुके है, उनसे परिचर्चा करके, उनको पुनः परीक्षण द्वारा उसकी सत्यता की जांच करके, अनुसंधानकर्ता अपनी भी सूझ से सृजनात्मक चिंतन कर अपनी भी उपकल्पना का निर्माण कर सकता है। 7
परिकल्पना के प्रकार:-
शोध विशेषज्ञों ने परिकल्पना के कई प्रकार की चर्चा की है। श्री एम.एच.गोपाल ने ‘‘इन इन्ट्रोडक्शन टू रिसर्च प्रोसीजर इन शोसल साइन्स’’ में परिकल्पना के दो प्रकारों का उल्लेख किया है -
1. अशुद्ध, मिली जुली अथवा मौलिक परिकल्पनाएं
2. विशुद्ध तथा पुनर्परीक्षित परिकल्पनाएं
1. मौलिक परिकल्पनाएं:- ये परिकल्पनाएं सामान्यतः निम्न स्तरीय विचारधाराएॅ होती है जो अधिकांशतः केवल संकलित की जा सकने वाली सामग्री को बताती हैं।
2. विशुद्ध परिकल्पनाएं:- ये परिकल्पना ही वास्तव में अधिक महत्वपूर्ण होती है। इन परिकल्पनाओं का निर्माण अनेक अध्ययनों के आधार पर निकाले गये निष्कर्षो पर आधारित होता है। इस परिकल्पना को तीन भागों में विभाजित किया है -
(अ) सामान्य स्तरीय परिकल्पनाएं
(ब) जटिल आदर्श परिकल्पनाएं
(स) जटिलतम अन्तः संबंधित चर परिकल्पनाएं। 8
गुडे एवं हाॅट ने तीन प्रकार की परिकल्पनाओं का उल्लेख किया है:-
1. अनुभावश्रित समानताओं से बताने वाली उपकल्पनाएं - ये वे उपकल्पनांए है, जिसका संबंध सामान्य जीवन में स्वीकृत या प्रचलित विचार एवं व्यवहार से होता है। लोकोक्तियों, कहावतों आदि में इस प्रकार की मान्यताओं का उल्लेख मिलता है।
2. जटिल आदर्श प्रारूप से संबंद्ध उपकल्पनाएं:- इस प्रकार की उपकल्पनाएॅ सामान्य ज्ञान या स्वीकृत मान्यताओं या जीवन के अनुभवाश्रित समानताओं से आगे बढ़कर उन तार्किक संबंधों पर बल देते है, जिनका संबंध आदर्श प्रारूपों से है। चूंकि ये अनुभवाश्रित वास्तविकता से दूर होता है इसलिये इन्हें आदर्श प्रारूप कहा जाता है।
3. विश्लेषणात्मक चरों से संबंध उपकल्पनाएॅ:- ये उपकल्पनाएॅ आदर्श प्रारूपों से भी आगे बढ़कर विभिन्न कारणों के तार्किक संबंधों को विश्लेषित करती है। इस प्रकार की परिकल्पनाएॅ यह बताती है कि किस प्रकार एक कारक की विशेषता में परिवर्तन के कारण दूसरे चर में भी अंतर उत्पन्न होता है।9
फिलिप्स ने निम्न प्रकार की उपकल्पनाओं का उल्लेख किया है -
1. वर्णनात्मक उपकल्पना - इस प्रकार की उपकल्पनाओं में किसी दिये गए चर या कारक के प्रकार या घटित होने से संबंधित प्रश्न रखे जाते है। ये वर्णनात्मक अध्ययन के आधार पर बनाए जाते है। जैसे - ‘‘भारत की 80ः जनसंख्या कृषि रोजगार पर आश्रित है।’’
2. संबन्धात्मक उपकल्पना - इस प्रकार की उपकल्पनाएॅ दो या अधिक कारकों के परस्पर संबंध या कारणो-परिणामों के मध्य संबंध को व्यक्त करती है। तुलनात्मक अध्ययन के लिये हम संबंध परिकल्पना का निर्माण करते है। जैसे - ‘‘आयु व मानसिक स्वास्थ्य में विरोधी संबंध होता है।’’ तथा ‘‘जो जितने अधिक धनी होते है वे जनकल्याण में उतने ही रूचि लेते है।’’
इनमें दो कारक है पहले में ‘‘आयु व मानसिक स्वास्थ्य’’ और दूसरे में ‘‘धनी होना व जनकल्याण में रूचि।’’ इनमें से आयु व धनी होना प्रथम प्रकार के कारक, जो कि कारण है, स्वतंत्र चर कहलाएंगे जबकि मानसिक स्वास्थ्य या जनकल्याण में रूचि - परिणाम व निर्भर चर कहलाएंगे।
3. कारणात्मक उपकल्पना - ये वे संबंधात्मक उपकल्पनाएॅ जो कारको के बीच कारण प्रभाव संबंध को दर्शाती है। जैसे - ‘‘काम के घंटों में वृद्धि के साथ कार्य संतुष्टि के कमी आती है।’’ या ‘‘उच्च शिक्षा प्राप्त व्यक्ति अधिक गतिशील होते है।’’ इनमें एक कारक अनुमित कारण के रूप में प्रस्तुत किया गया है जैसे - काम के घंटे या शिक्षा और दूसरे कारक को अनुमित प्रभाव के रूप में प्रस्तुत किया गया है जैसे - कार्य संतुष्टि या गतिशील। 10
परिकल्पना की विशेषताएॅ:- उपकल्पना वैज्ञानिक अध्ययन के योग्य तभी मानी जा सकती है जब उसमें निम्नलिखित गुण या विशेषताएॅ मौजूद हो -
1. स्पष्टता:- परिकल्पना की धारणाएॅ स्पष्ट, सुनिश्चित तथा सामान्य होनी चाहिए ताकि वैज्ञानिक रूप से उसका अध्ययन हो सके। ऐसी स्पष्ट उपकल्पना ही अध्ययनकर्ता का सही लक्ष्य, सीमा व दिशा सुनिश्चित करती है।
2. प्रयोग सिद्धता:- परिकल्पना का संबंध अनुभाविक प्रयोग सिद्धता से होनी चाहिए। जो परिकल्पना बनेगी वह भी अनुभव के आधार पर बनेगी, कभी ऐसी परिकल्पना न बनाया जाय जो आदर्श पर आधारित हो। शोधार्थी की परिकल्पना बनाते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि वास्तविक तथ्यों के आधार पर होना चाहिए। उसमें वास्तविकता का तत्व होना चाहिए, आदर्श नही।
3. विशिष्टता:- कोई भी परिकल्पना सामान्य न होकर विषय के किसी विशिष्ट पक्ष से संबंधित होनी चाहिए। यदि शोधार्थी अध्ययन विषय के सभी तथ्यों को लेकर परिकल्पना का निर्माण करेगा तो एक ही समय में सभी पक्षों का यथार्थ अध्ययन नहीं कर सकता है।
4. परीक्षणयोग्य:- परिकल्पना परीक्षण योग्य होनी चाहिए। परिकल्पना इस प्रकार होनी चाहिए कि उसकी सत्यता की जांच अनुसंधान की उपलब्ध प्रविधियों से संभव हो सके। अनुसंधान प्रविधियों को निर्मित करने के लिये भी किये जाते है।
5. सिद्धांत समूह से संबंद्धता:- परिकल्पना का संबंध किसी सिद्धांत से होना चाहिए। पूर्व के अध्ययन मेें किये गये सिद्धांत पर आधारित परिकल्पना होनी चाहिए।
6. सरलता:- परिकल्पना सरल होनी चाहिए। कोई भी परिकल्पना जो समस्या का सरलतम एवं स्पष्ट उत्तर प्रस्तुत करती होगी, उसके परीक्षण में कठिनाई नहीं आयेगी। अतः परिकल्पना की शब्दावली सरल व स्पष्ट होनी चाहिए, उसमें भ्रमपूर्ण भाषा का प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए।
7. परिकल्पना समस्या का पर्याप्त उत्तर हो:- एक अच्छी परिकल्पना एक समस्या के लिये एक उपयुक्त उत्तर का सुझाव देती है। यह अनुसंधानकर्ता के अनुभव और उसकी सूझ पर निर्भर है कि अनेक परिकल्पनाओं में से किसे अपने परीक्षण का विषय बनायें। 11
परिकल्पना का महत्व:-
किसी भी अध्ययन को वैज्ञानिक रूप देने में परिकल्पना का अति महत्वपूर्ण स्थान होता है। इस संबंध में जहोदा एवं कुक ने अपने विचारों को व्यक्त करते हुए लिखा है कि - ‘‘परिकल्पनाओं का निर्माण तथा सत्यापन करना ही वैज्ञानिक अध्ययन का प्रमुख उद्देश्य होता है।’’ 12
परिकल्पना के महत्व को निम्नलिखित ढंग से प्रस्तुत कर सकते है।
1. अध्ययन के उद्देश्य का निर्धारण:- परिकल्पना के उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए पी.वी. यंग का कथन है कि ‘‘परिकल्पना से अनुसंधानकर्ता ऐसे तथ्यों को एकत्रित करने से बच जाता है जो बाद में अध्ययन विषय के लिये व्यर्थ सिद्ध होते हैं।’’ प्रत्येक सर्वेक्षण की वास्तविकता को जानने के लिये अनुसंधानकर्ता को पर्याप्त समय व धन की आवश्यकता होती है।
2. अध्ययन क्षेत्र को सीमित करने में सहायक:- अध्ययनकर्ता परिकल्पना की मदद से अपने अध्ययन क्षेत्र को सीमित करने में सहायक होता है। इस प्रविधि में यह ध्यान रहता है कि कौन सी सूचनाएॅ, उसे कब तथा कहाॅ से प्राप्त होगी।
3. अध्ययन क्षेत्र को सही दिशा देना:- परिकल्पना के अध्ययन को उसके कार्य की उपयुक्त दिशा प्रदान करने में महत्वपूर्ण स्थान होता है। इस संबंध में श्रीमति यंग ने विचार व्यक्त करते हुए कहा है कि - ‘‘परिकल्पना व प्रयोग एक दृष्टिहीन खोज में रक्षा करता है।’’
4. उपयोगी तथ्यों के संकलन में सहायक:- किसी भी समस्या का अध्ययन करते समय अध्ययनकर्ता के सामने अनेकानेक प्रकार के तथ्य आते है। इस संबंध में हंसराज का कहना है कि ‘‘परिकल्पना की सहायता से यह निश्चित करना आसान हो जाता है कि किन तथ्यों को एकत्रित किया जाये और किन्हें सरलता से छोड़ा जा सकता है।’’
5. निष्कर्षों तथा समाधान में सुविधा:- तथ्यों के आधार पर ही परिकल्पना का परीक्षण एवं पूर्व परीक्षण करते है। इसी के निष्कर्ष के रूप में हम अपने पूर्व कथन को सत्य प्रमाणित करते है, अथवा गलत पाते है। उदाहरण के तौर पर - यह परिकल्पना ‘‘हिन्दू विवाहों में वर पक्ष में केवल आर्थिक आकर्षण हेतु ही दहेज प्रथा प्रचलित हुई।’’ असत्य भी सिद्ध होती है, तो भी इससे कुछ वास्तविकता तो मालूम होती ही है। 13
निष्कर्ष:-
इस प्रकार यह स्पष्ट है कि, परिकल्पना सामाजिक विज्ञान के शोध प्रविधि में अत्यंत ही महत्वपूर्ण है। यह अनुसंधान की दिशा निर्धारित करती है, तथा संकलन व संगठन के लिये सीमा निर्धारित करती है, और सिद्धांतों का निर्माण, संशोधन या खंडन द्वारा विषय के विकास में महत्वपूर्ण योगदान देती है। परिकल्पना के बिना अनुसंधान दिशाहीन, विचारहीन विचरण के समान है। इसीलिए कालिंजर ने कहा है - ‘‘इसमें शायद ही संदेह हो की उपकल्पनाएॅ वैज्ञानिक अनुसंधान के लिये महत्वपूर्ण एवं अपरिहार्य यंत्र है।’’ 14
संदर्भ सूची:-
1. मुखर्जी डाॅ रविन्द्रनाथ, सामाजिक शोध व सांख्यिकी, दिल्ली 1997 पृष्ठ - 142
2. उपाध्याय, डाॅ. हरिश्चन्द्र, सामाजिक सर्वेक्षण अनुसंधान एवं सांख्यिकी, दिल्ली 1990 पृ. - 86
3. वही, पृ - 81
4. सिंह, डाॅ. डी.एस., वैज्ञानिक सामाजिक अनुसंधान एवं सर्वेक्षण के मूलतत्व, इन्दौर-2001 पृ-121
5. श्रीवास्तव, डाॅ. ए.आर.एन. एवं चैबे, डाॅ. रमेश - सामाजिक अनुसंधान तथा शोध प्रविधियां - भोपाल - 2010 पृ - 65
6. उपाध्याय, डाॅ. हरिश्चन्द्र, सामाजिक सर्वेक्षण अनुसंधान एवं सांख्यिकी, दिल्ली 1990 पृ-86, 87
7. श्रीवास्तव, डाॅ. ए.आर.एन. एवं चैबे, डाॅ. रमेश - सामाजिक अनुसंधान तथा शोध प्रविधियां - भोपाल-2010 पृ-66
8. नाराणी, प्रकाश नारायण, सामाजिक अनुसंधान एवं सर्वेक्षण, जयपुर - 2000, पृ - 54
9. श्रीवास्तव, डाॅ. ए.आर.एन. एवं चैबे, डाॅ. रमेश - सामाजिक अनुसंधान तथा शोध प्रविधियां-भोपाल - 2010 पृ-60, 61
10. वही, पृ - 61, 62
11. वही, पृ - 66
12. उपाध्याय, डाॅ. हरिश्चन्द्र, सामाजिक सर्वेक्षण अनुसंधान एवं सांख्यिकी, दिल्ली 1990 पृ-93
13. वही, पृ - 94
14. श्रीवास्तव, डाॅ. ए.आर.एन. एवं चैबे, डाॅ. रमेश - सामाजिक अनुसंधान तथा शोध प्रविधियां - भोपाल - 2010 पृ - 72
Received on 11.12.2011
Revised on 05.01.2012
Accepted on 11.01.2012
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Research J. Humanities and Social Sciences. 3(2): April-June, 2012, 201-204